Sunday, September 8, 2013

**** पंछी **** (One from my archive )


ओ पंछी सरताज गगन के........ तुझे न कभी कोई पिंजरा भाया
उड़ना तेरी निराली शान,
चहचहाना एक मधुर है गान 

मस्त होकर तू डोल रहा हवाओ में ,
वृक्षों की उलझी लताओं में ,
नीले अम्बर की छांव में 

मुझे भी ले चल तू अपने संग ,
में भी देखू दुनिया के रंग

काश मेरे भी पंख उग जाये ,
आजादी की नहीं उमंग भर आये

चाहे पिंजरा क्यूँ न सजा हो सोने चांदी के तारो से ,
या फिर ऐशो आराम और अनेको वैभवो से,
पर तुझे ये रास ने आया
ओ पंछी  सरताज गगन के ...तुझे न कभी कोई पिंजरा भाया...

1 comment:

Anonymous said...

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