ओ पंछी सरताज गगन के........
तुझे न कभी कोई पिंजरा भाया
उड़ना तेरी निराली शान,
चहचहाना एक मधुर है
गान
मस्त होकर तू डोल रहा
हवाओ में ,
वृक्षों की उलझी लताओं
में ,
नीले अम्बर की छांव
में
मुझे भी ले चल तू अपने
संग ,
में भी देखू दुनिया
के रंग
काश मेरे भी पंख उग
जाये ,
आजादी की नहीं उमंग
भर आये
चाहे पिंजरा क्यूँ
न सजा हो सोने चांदी के तारो से ,
या फिर ऐशो आराम और
अनेको वैभवो से,
पर तुझे ये रास ने
आया
ओ पंछी
सरताज गगन के ...तुझे न कभी कोई पिंजरा भाया...
1 comment:
Hindi poem
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